पाठ्यक्रम: जीएस-3/बुनियादी ढाँचा
सन्दर्भ
- रक्षा मंत्री ने कहा कि दुनिया भर में पारंपरिक जहाज निर्माण उद्योगों की घटती क्षमताओं से उत्पन्न रिक्त स्थान भारत के लिए वैश्विक जहाज निर्माण केंद्र के रूप में उभरने का एक बड़ा अवसर प्रस्तुत करता है।
जहाज निर्माण का परिचय
- जहाज निर्माण से आशय परिवहन, रक्षा और व्यापार के लिए उपयोग किए जाने वाले जलयानों के निर्माण, मरम्मत और रखरखाव से है।
- जहाज निर्माण का कार्य विशेष सुविधाओं से युक्त जहाज निर्माण कारखानों (Shipyards) में किया जाता है, जहाँ बड़े पैमाने की परियोजनाओं और जटिल संयोजन प्रक्रियाओं को संभालने की क्षमता होती है।
- एशिया-प्रशांत क्षेत्र 2023 में जहाज निर्माण और मरम्मत बाजार का सबसे बड़ा क्षेत्र था। इसका बाजार में 49% हिस्सा, अर्थात् 118.12 अरब डॉलर, था।
- इसके बाद पश्चिमी यूरोप, उत्तरी अमेरिका और फिर अन्य क्षेत्र थे।
भारत में स्थिति
- भारत का जहाज निर्माण का लंबा इतिहास रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता में प्रारंभिक जहाजों का निर्माण और अंतरराष्ट्रीय व्यापार किया जाता था, जो भारत के समृद्ध समुद्री इतिहास का आधार है।
- गुजरात, महाराष्ट्र और बंगाल व्यापार तथा युद्ध के लिए बड़े आकार के लकड़ी के जहाजों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध थे।
- मध्यकाल में भारतीय जहाज निर्माताओं ने उन्नत तकनीक से युक्त जहाजों का निर्माण किया, जिनकी काफी माँग थी।
- स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नौसैनिक और रक्षा जहाज निर्माण को प्राथमिकता देने के कारण भारत ने कई महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र के जहाज निर्माण कारखाने स्थापित किए।
- वर्तमान में वैश्विक जहाज निर्माण बाजार में भारत की हिस्सेदारी केवल 0.06% है। यह चीन, दक्षिण कोरिया और जापान के प्रभुत्व के बिल्कुल विपरीत है, जो सामूहिक रूप से इस उद्योग के 85% हिस्से को नियंत्रित करते हैं।

भारत में जहाज निर्माण उद्योग के विकास के अनुकूल कारक
1. सामरिक स्थिति
- भारत की विस्तृत तटरेखा और प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों के निकटता जहाज निर्माण कारखानों के लिए प्राकृतिक लाभ प्रदान करती है। इससे परिवहन लागत और जहाजों के आवागमन में लगने वाला समय कम करने में मदद मिलती है।
2. प्रतिस्पर्धी श्रम लागत
- अन्य जहाज निर्माण करने वाले देशों की तुलना में भारत में श्रम लागत कम है, जिससे भारत अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए एक आकर्षक विकल्प बनता है।
3. विशिष्ट क्षेत्रों पर ध्यान
- भारतीय जहाज निर्माण कारखाने अपतटीय सहायता पोत, ड्रेजर और नौका जैसी विशेष श्रेणियों में विशेषज्ञता विकसित कर रहे हैं और विशिष्ट बाजार माँगों को पूरा करने पर ध्यान दे रहे हैं।
4. सरकारी समर्थन
- भारत में जहाज निर्माण कारखानों को वित्तीय सहायता योजना (SFAS) जैसी नीतिगत पहलों तथा स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता को बढ़ाने पर जोर देने से जहाज निर्माण क्षेत्र के विकास को गति मिल रही है।
महत्व
- जहाज निर्माण एक पूँजी-प्रधान उद्योग है, जिसके लिए उन्नत तकनीक, कुशल श्रम और मजबूत नीतिगत समर्थन की आवश्यकता होती है।
- यह इलेक्ट्रॉनिक्स, इस्पात, इंजीनियरिंग और समुद्री उपकरण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करता है।
- एक मजबूत घरेलू जहाज निर्माण उद्योग भारत की नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) को मजबूत कर सकता है। यह “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” कार्यक्रमों के अंतर्गत एक प्रमुख प्राथमिकता वाला क्षेत्र है।
- इससे देश के व्यापार संतुलन में सुधार होगा और आयात पर निर्भरता कम होगी।
- सामरिक दृष्टि से भारत की रक्षा क्षमता और समुद्री सुरक्षा काफी हद तक जहाज निर्माण पर निर्भर करती है।
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए भारत अपने नौसैनिक बेड़े को मजबूत करने के लिए नौसैनिक आधुनिकीकरण तथा विमानवाहक पोतों, पनडुब्बियों और युद्धपोतों के निर्माण में निवेश कर रहा है।
भारत के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
1. उत्पादन की उच्च लागत
- चीन, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे प्रमुख जहाज निर्माण देशों की तुलना में भारतीय जहाज निर्माण कारखानों की उत्पादन लागत अधिक है। इसके प्रमुख कारण महँगे इनपुट, वित्तपोषण की उच्च लागत और अपेक्षाकृत कम पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ हैं।
2. दीर्घकालिक वित्त तक सीमित पहुँच
- जहाज निर्माण एक अत्यधिक पूँजी-प्रधान उद्योग है और इसकी परियोजनाओं में निवेश का लाभ मिलने में लंबा समय लगता है। ऐसे में दीर्घकालिक वित्तपोषण तक सीमित पहुँच एक बड़ी चुनौती है।
3. तकनीकी अंतर
- उन्नत जहाज डिजाइन, स्वचालन, समुद्री इंजीनियरिंग, विशेषीकृत जलयानों और हरित जहाज प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में भारत अभी भी प्रमुख जहाज निर्माण देशों से पीछे है।
4. खंडित जहाज निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र
- भारत में जहाज निर्माण उद्योग में जहाज निर्माण कारखानों, घटक निर्माताओं, डिजाइनरों, आपूर्तिकर्ताओं, बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स प्रदाताओं और अनुसंधान संस्थानों को जोड़ने वाले पर्याप्त रूप से एकीकृत औद्योगिक समूहों का अभाव है।
5. मजबूत वैश्विक प्रतिस्पर्धा
- चीन, दक्षिण कोरिया और जापान बड़े पैमाने पर उत्पादन, स्थापित आपूर्ति शृंखलाओं, तकनीकी क्षमताओं और पर्याप्त सरकारी समर्थन के माध्यम से वैश्विक वाणिज्यिक जहाज निर्माण पर प्रभुत्व रखते हैं। इससे भारतीय जहाज निर्माण कारखानों के लिए कीमत और आपूर्ति समयसीमा के मामले में प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाता है।
सरकारी पहल
1. जहाज निर्माण वित्तीय सहायता योजना
- ₹24,736 करोड़ के परिव्यय वाली जहाज निर्माण वित्तीय सहायता योजना के तहत वित्तीय सहायता और जहाज तोड़ने से संबंधित क्रेडिट नोट्स प्रदान किए जाते हैं।
- यह योजना राष्ट्रीय जहाज निर्माण मिशन के माध्यम से घरेलू जहाज निर्माण को बढ़ावा देने और देश में जहाज निर्माण क्षमता को मजबूत करने पर केंद्रित है।
2. समुद्री विकास कोष
- ₹25,000 करोड़ के परिव्यय वाले समुद्री विकास कोष का उद्देश्य निवेश को बढ़ावा देना तथा ब्याज संबंधी प्रोत्साहन प्रदान करना है।

3. जहाज निर्माण विकास योजना
- ₹19,989 करोड़ के परिव्यय वाली जहाज निर्माण विकास योजना जहाज निर्माण समूहों के लिए पूँजीगत सहायता, जोखिम कवरेज और क्षमता निर्माण का प्रावधान करती है।
4. समुद्री भारत दृष्टि 2030 (MIV 2030)
- इसका उद्देश्य 2030 तक भारत को विश्व के शीर्ष 10 जहाज निर्माण देशों में शामिल करना तथा एक विश्वस्तरीय, कुशल और टिकाऊ समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।
- इसमें समुद्री क्षेत्र के 10 प्रमुख क्षेत्रों में 150 से अधिक पहलों को शामिल किया गया है।
5. प्रथम अस्वीकृति का अधिकार (RoFR)
- सरकारी निविदाओं में जलयानों की खरीद के लिए भारतीय जहाज निर्माण कारखानों को प्राथमिकता दी जाती है।
- संशोधित प्राथमिकता क्रम में भारत में निर्मित, भारतीय ध्वज वाले और भारतीय स्वामित्व वाले जलयानों को प्राथमिकता दी गई है।
6. सार्वजनिक खरीद में प्राथमिकता
- मेक इन इंडिया आदेश, 2017 के अनुसार ₹200 करोड़ से कम लागत वाले जहाजों की खरीद भारतीय जहाज निर्माण कारखानों से करना अनिवार्य है।
7. मानकीकृत टग डिजाइन
- प्रमुख बंदरगाहों में उपयोग के लिए टग के पाँच मानकीकृत डिजाइन जारी किए गए हैं। इसका उद्देश्य एकरूपता सुनिश्चित करना तथा घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना है।
8. जहाज निर्माण समूहों का विकास
- प्रमुख बंदरगाहों और तटीय राज्यों के बीच जहाज निर्माण समूहों के विकास के लिए समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
- इन समूहों को संयुक्त निवेश के माध्यम से विकसित करने का उद्देश्य भारत को 2047 तक विश्व के शीर्ष पाँच जहाज निर्माण देशों में शामिल करना है।
निष्कर्ष
- भारत का जहाज निर्माण क्षेत्र विकास के एक आशाजनक चरण में प्रवेश कर रहा है। इसे कई प्रगतिशील पहलों और नीतिगत सुधारों का समर्थन प्राप्त है।
- इन उपायों का उद्देश्य बुनियादी ढाँचे का आधुनिकीकरण, घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाना और वैश्विक निवेश को आकर्षित करना है, जिससे दीर्घकालिक विकास के लिए मजबूत आधार तैयार हो रहा है।
- नवाचार, सतत विकास और कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित करके यह क्षेत्र समुद्री भारत दृष्टि 2030 (Maritime India Vision 2030) में निर्धारित सामरिक लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में बेहतर स्थिति में है।
स्रोत: TH
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